मतंग ऋषि
मतंग ऋषि (संस्कृत: मतंग , Mataṅga) हिंदू धर्म के एक प्राचीन ऋषि हैं जिनका उल्लेख रामायण, महाभारत, पुराणों, तथा शाक्त‑तांत्रिक परंपराओं में मिलता है। रामायण में वे एक ब्रह्मर्षि के रूप में वर्णित हैं, जिनका आश्रम ऋष्यमूक पर्वत के निकट स्थित था। यह स्थान भगवान राम और सुग्रीव की पहली भेंट का स्थल माना जाता है।[1]
रामायण में मतंग ऋषि
वाल्मीकि रामायण के अनुसार, वानरराज वाली ने दुंदुभि राक्षस का वध किया और उसका रक्त या शरीर का भाग मतंग ऋषि के आश्रम क्षेत्र में पहुँच गया। इससे क्रोधित होकर मतंग ने वाली को श्राप दिया कि यदि वह ऋष्यमूक पर्वत पर आएगा तो उसकी मृत्यु हो जाएगी।
इसी श्राप के कारण सुग्रीव और हनुमान उस पर्वत पर सुरक्षित रहे, और यहीं भगवान राम और सुग्रीव की पहली मुलाकात हुई।[2]
मतंग ऋषि को शबरी के गुरु के रूप में भी जाना जाता है। उन्होंने शबरी को आशीर्वाद दिया था कि भगवान राम उनके आश्रम अवश्य आएँगे और उनकी भक्ति स्वीकार करेंगे।
महाभारत में मतंग ऋषि
महाभारत के अनुशासन पर्व में मतंग ऋषि की एक भिन्न कथा मिलती है। यहाँ उन्हें एक चांडाल पिता और ब्राह्मणी माता का पुत्र बताया गया है।[3]
अपनी जाति का ज्ञान होने पर उन्होंने कठोर तपस्या की ताकि ब्राह्मणत्व प्राप्त कर सकें। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर इंद्र ने उन्हें छन्दोदेव — छंदों के देवता — का वरदान दिया। इस वरदान से वे तीनों लोकों में पूजनीय हुए और इच्छानुसार रूप धारण करने में समर्थ बने। [4]
पुराणों में मतंग ऋषि
मतंग ऋषि का उल्लेख कई पुराणों में मिलता है, जिनमें—
1. पद्म पुराण
मतंग को एक महान तपस्वी बताया गया है, जिन्होंने विभिन्न देवताओं की उपासना की और दिव्य सिद्धियाँ प्राप्त कीं।[5]
2. स्कंद पुराण
यहाँ मतंग आश्रम का उल्लेख पंपा सरोवर और ऋष्यमूक पर्वत के संदर्भ में मिलता है। स्कंद पुराण के वनखंड में शबरी‑राम प्रसंग से संबंधित विवरण भी मिलता है।[6]
3. ब्रह्मवैवर्त पुराण
इसमें मतंग को देवी‑उपासना का ज्ञाता बताया गया है और मातंगी देवी के संबंध में उनका उल्लेख मिलता है।[7]
4. ललिता‑सहस्रनाम परंपरा
श्रीविद्या परंपरा में मतंग को देवी ललिता के उपासक और मंत्र‑विद्या के आचार्य के रूप में वर्णित किया गया है।[8]
शाक्त और तांत्रिक परंपरा में मतंग
शाक्त‑तांत्रिक परंपराओं में मतंग ऋषि को मंत्र‑विद्या, तंत्र‑शास्त्र और देवी‑उपासना का महान आचार्य माना गया है। उनकी पुत्री मातंगी को दस महाविद्याओं में से एक माना जाता है। मातंगी को—
वाणी, संगीत और आंतरिक ज्ञान की देवी
ललिता त्रिपुरसुंदरी की सहचरी
तांत्रिक परंपरा में “उच्छिष्ट‑चाण्डाली” स्वरूप
के रूप में वर्णित किया गया है।[9]
मतंग ऋषि और संगीतशास्त्र
मतंग ऋषि को परंपरागत रूप से संगीतशास्त्र के एक महत्वपूर्ण ग्रंथ बृहद्देशी का रचयिता भी माना जाता है। यह ग्रंथ भारतीय संगीत में राग की अवधारणा को पहली बार व्यवस्थित रूप से परिभाषित करता है।[10]
महत्व
मतंग ऋषि की कथा भारतीय परंपरा में—
भक्ति की निरपेक्षता
सामाजिक समानता
तपस्या की शक्ति
गुरु‑शिष्य परंपरा
देवी‑उपासना और तांत्रिक ज्ञान
का प्रतीक मानी जाती है। शबरी और राम का प्रसंग यह दर्शाता है कि भक्ति जाति‑भेद से परे होती है। [11]
संबंधित स्थल
मतंग पहाड़ी (Matanga Hill) — हम्पी में स्थित एक पर्वत, जिसे मतंग ऋषि से संबंधित माना जाता है।
पंपा सरोवर — शबरी और मतंग आश्रम से जुड़ा पवित्र स्थल।
संदर्भ
Подробнее: https://en.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AE ... 7%E0%A4%BF
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